एक बार एक गांव में बहुत ही अमीर जमींदार था। उसको अपने पैसों पर बड़ा घमंड होता था। जितना उसके पास पैसा था, वह उतना ही कंजूस था। जो उसके खेतों में काम करने वाले किसानों थे वह उनसे खूब काम करवाता, पर उन्हे पेसै कौड़ी भर भी नही देता था। उन गरीब किसानो को मन मारकर उसके खेत में काम करना पडता था।


गरीब किसान अमीर जमींदार

उसी गांव में एक रामू नाम का भी किसान रहता था। उसके पास अपनी थोड़ी सी जमीन थी। उसी में वो खेती-बाड़ी करके अपना और अपने परिवार का गुजारा कर लेता था। रामू मेहनती भी बोहत था। वह मेहनत से अपने खेत में काम करके इतनी फसल प्राप्त कर लेता था कि जिससे वह अपने परिवार को दो वक्त की रोटी दे सके।

गांव के बाकी किसानों की जमीन रामू से अधिक थीं। वे किसान देखकर हैरान होते कि रामू कैसे इतनी सी जमीन में इतनी सारी फसल उगा लेता है। एक साल गांव में भयंकर सूखा पड़ गया। बिना बारिश के सारे खेत सूखने लगे। गरीब किसानों के पास अब सिंचाई की कोई भी व्यवस्था नही थी। वे बस अब बारिश पर ही निर्भर थे। इसलिए इस साल उन सारो की फसल बर्बाद हो गई। अब उनकी भूखे मरने की नोबत आ गई थी। फिर वह गांव के बडे जमींदारो से कर्ज मांगने गया।

जमींदार तो कंजूस था। "उसने सोचा अगर मेने रामू को पैसे दे दिए, तो यह पेसै लौटा नहीं पाएगा। इसलिए मे रामू को अपने खेतो में काम पर लगा लेता हूं। वेसे भी मेहनती तो ये है ही, और मजबूर भी है। इससे कम पैसों में दुगुनी मेहनत करवाऊंगा।"

उसने रामू को कहा, “देख रामू!
मैं तुझे कर्ज नहीं दे सकता,
लेकिन तेरी एक मदद कर सकता हूं!
मे तुझे अपने खेत में काम पर रख लेता हूँ ओर तुझे महीने के पूरे हजार रुपए दे दिया करूंगा।”

रामू “मालिक हजार? पर दूसरे तो दो हजार देते है।

जमींदार “ तुझे करना है तो कर ले। वरना मे किसी ओर को रख लेता हूँ।

मजबूर रामू क्या कर सकता था? वह हामी भरकर घर पर लौट आया। अगले दिन से वो जमीदार के खेतो में काम करने लगा। रामू मेहनती तो वह था ही। वह खूब मेहनत करता और पूरी लगन से काम करता। उसने जल्दी-जल्दी से चार महिनो के काम को दो महीनो में ही कर दिया। यह देखकर जमींदार भी बहुत खुश हुआ। पर उसके मन में मक्कारी जाग उठी। उसने अगले दिन रामू को बुलाया और उसको बस दो महीनो के पैसे देकर कहा, “रामू बस अब कल से मत आना। क्योकी अब मुझे तेरी कोई जरूरत नहीं है।” रामू ने उसके आगे बहुत भीख मांगी पर कंजूस जमीदार ने तो उसकी एक भी न सुनी।

रामू रोज सुबह जाकर जमींदार के घर के सामने बैठ जाता और जमींदार रोज उसे भगा देता था। पूरे गांव में ये बात फेल गई। सब लोग जमींदार को भला बुरा कहने लगे। लोगो से तंग आकर जमीदार कुछ दिनो के लिए परिवार सहित दूसरे गांव मे चला गया। दस पंद्रह दिनो के बाद घर आकर उसने देखि की रामू अब वहाँ नही था। जमीदार सोचने लगा आखिर रामू ने अब आना बंद क्यों कर दिया है। उसने जब गांव से पूछा तो उसे पता चला कि रामू घायल हो गया है।

जमींदार ने पूछा, “ये केसै हुआ?”

एक जमींदार ने बताया, “मालिक! आप जब दूसरे गांव मे चले गए थे, तब एक दिन रामू आपके घर के सामने बैठा था। उस दिन कुछ चोर आपके घर में घुसे गए थे। लेकिन वे रामू की नजर में आ गए रामू ने बिना अपनी जान की परवाह किए उनसे उलझ गया और उन सबको भगा दिया। उस हाथ पाई मे ही रामू घायल हो गया।"

ये सब जानकर जमींदार खुद पर शर्मिन्दा हुआ की उसने रामू के साथ कितना बुरा किया। फिर वह रामू के घर गया, उसने देखा कि रामू तो बड़ी बूरी अवस्था में चारपाई पर पड़ा था। ये देखकर जमींदार ने उससे माफी मांगी ओर उसका इलाज करवाया। पूरा ठीक होने के बाद उसको फिर से काम पर रख लिया।